TRIPATHI JI
खुश रहो लेकिन कभी संतुष्ट मत रहो ।
Sunday, June 27, 2010
रोज़ तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल नहीं जो अंधेरों में निकल पड़ता है ,
उनकी याद आई है ऐ सांसों जरा धीरे से चलो ,
'राज़' धडकनों से भी इबादत में खलल पड़ता है !
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